ग्रन्थालय विज्ञान में वर्गीकरण की उपयोगिता
सतीष कुमार
एम. लिब. महर्षि दयानन्द विष्वविधालय, रोहतक
*Corresponding Author E-mail: satish98641@gmail.com
ABSTRACT:
इस पेपर के माध्यम से पुस्तकालय वर्गीकरण का आगमन, विकास तथा इसकी आवष्यकता पर प्रकाष डाला गया है। पुस्तकालय के क्षेत्र में वर्गीकरण एक आधार स्तम्भ के रूप में किस प्रकार सहायक होने के साथ-साथ पुस्तकालय के सौन्दर्य एवं उपयोगिता में सहायक है, का वर्णन किया गया है। इस क्षेत्र में वर्गीकरण के सभी आवष्यक पहलुओं की चर्चा की जाएगी।
KEYWORDS: पुस्तकालय वर्गीकरण, आवष्यकता, द्विबिन्दू, डेवी दषमलव वर्गीकरण आदि।
आमुख/भूमिकाः-
वर्गीकरण का पितामह अरस्तु को माना जाता है। इन्होने सर्वप्रथम पषुओं और पौधो का वर्गीकरण किया इनका जन्म (384 ई. पू.) हुआ था। इन्हें जीव विज्ञान का सम्मान भी प्राप्त है। इनके गुरू प्लेटों तथा षिष्य सिकंदर थे। ये यूनानी दार्षनिक थे। आधुनिक वर्गीकरण का पिता लीनियस को कहा जाता है।
पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में वर्गीकरण का श्रेय भारतीय पुस्तकालय विज्ञान के जनक डा. एस. आर. रंगनाथन को जाता है। इनका जन्म 12 अगस्त 1892 में षियाली, तमिलनाडू, भारत में तथा मृत्यु 27 सितम्बर 1972 को बैंगलोर, भारत में हुई। डा0 एस. आर. रंगानाथन ने पुस्तकालय के क्षेत्र में कोलन वर्गीकरण तथा कलासिफाइड़ कैटालाग कोड का निर्माण किया । जो पुस्तकालय विज्ञान वर्गीकरण का आधार रूप धारण किए हुए है।
किसी भी क्षेत्र में चाहे वह षिक्षा का क्षेत्र हो या कोई अन्य सभी में बिना वर्गीकरण के हम उसका अनुभव और उपयोगिता को आत्मसात करने में असमर्थ से प्रतीत होते है। बिना वर्गीकरण के वस्तुओं, वर्गो, क्षेत्रों, एकलो का सही समन्वय व आकलन नहीं किया जा सकता। किसी क्षेत्र विषेष के कार्यो को सूचारू रूप से क्रियान्वयन करने तथा नियंत्रण में रखने के लिए वर्गीकरण एक अहम कड़ी होती है।
पुस्तकालय में विभिन्न प्रकार के संकायों के भिन्न-भिन्न प्रकार के विषयों को समझने तथा न्याय-संगत प्रचालित तथा नियंत्रण रखने हेतू वर्गीकरण अति आवश्यक पहलू है।
क्लासिफिकेषन लैटिन भाषा के षब्द क्लासिस से लिया गया है। जिसका अर्थ होता हैः- बांटने योग्य या वर्ग बनाना।
आधुनिक पुस्तकालय वर्गीकरण का पिता मेल्विल डेवी है। मेल्विल डेवी (1851-1931) न्यूयार्क, अमेरिका में जन्में तथा इनका निधन 80 वर्ष की उम्र में फलोरिडा, अमेरिका में हुआ। इन्होनें डेवी डेसीमल कलासिफिकेषन का सन् 1873 में प्रतिपादन तथा सन् 1876 में प्रकाषन किया जिसका निर्माण पुस्तकालय वर्गीकरण के लिए एक स्वर्णिम स्तम्भ के रूप में स्थापित हुआ।
परिभाषाः-
ग्रन्थालय वर्गीकरण का इतिहास सवा सौ वर्ष (125) से भी अधिक है। वर्तमान में पुस्तकालय वर्गीकरण का क्षेत्र विभिन्न षोध एवं अध्ययन की ओर अग्रसर है।
वर्गीकरण षब्दावली को अंतराष्ट्रीय स्तर पर विकसित करने में कलासिफिकेषन रिसर्च ग्रुप, लंदन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
पुस्तकालय का वर्गीकरण ज्ञान संगठन की एक प्रणाली है। जिसके द्वारा पुस्तकालय संसाधनों को विषय के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है। पुस्तकालय वर्गीकरण में एक नोटेषन सिस्टम का उपयोग करते है जो वर्गीकरण में विषयों के क्रम में संग्रहित करने की अनुमति देता है।
सेयर्स के अनुसारः- ‘‘ग्रन्थालय में व्यवस्थित पुस्तकों की आधारषिला वर्गीकरण है। बिना वर्गीकरण के कोई भी ग्रन्थालयाध्यक्ष सुव्यवस्थित ग्रन्थालय का निर्माण नहीं कर सकता है’’।
ई. सी. रिचर्ड़ के अनुसार, ‘‘ग्रन्थालय में पुस्तकों का संग्रह उपयोग के लिए किया जाता है अतः पुस्तकों के प्रयोगार्थ व्यवस्था ही ग्रन्थालय वर्गीकरण का उद्देष्य है।’’
डा. एस. आर. रंगानाथन के अनुसार , ‘‘ पुस्तकालय में संग्रहीत पुस्तक के आगमन के बाद उसे निर्धारित स्थान पर व्यवस्थित करना तथा पाठक के समय की बचत कर उसे अभीष्ट अंक प्रदान करना ही पुस्तकालय वर्गीकरण का उद्देष्य माना है।
पुस्तकालय वर्गीकरण की आवष्यकताः-
पुस्तकालय में वर्गीकरण की आवष्यकता के निम्न कारण हैः-
1- पाठकांे की अधिकता।
2- ज्ञान का विस्तार
3- विषयों की संयुक्तता।
4- सूचना सेवा में विस्तार।
5- नवीन विषयों का प्रादुर्भाव।
6- पाठ्य सामग्री के विविध रूप।
7- विविध भाषाओं में अनुवाद।
8- पाँच सुत्रों का अनुप्रयोग।
पुस्तकालय वर्गीकरण के प्रकारः-
· डेवी डेसीमल कलासिफिकेषन (डी डी सी)ः 1876
· कोलन कलासिफिकेषन (सी सी):1933
· ग्रन्थ वर्गीकरण को दो प्रकार के वर्गीकरण में विभाजित किया जाता है। 1 गहन वर्गीकरण 2 स्थूल वर्गीकरण।
· गहन वर्गीकरण में सुक्ष्म विषयों का वर्गीकरण किया जाता है। जैसेः- लाइब्रेरी आॅफ कांग्रेस कलासिफिकेषन।
· स्थूल वर्गीकरण छोटे पुस्तकालयों में प्रयोग में लाया जाता है। जैसेः- राइटर्स इंटरनेशनल कलासिफिकेषन।
डेवी दषमलव वर्गीकरण पद्वतिः-
· इस वर्गीकरण पद्वति का प्रतिपादन डब्लयू टी हैटिस की सलाह के बाद 6 महीने के अध्ययन के उपरांत 1873 में किया तथा प्रकाषन 1876 में किया गया।
· डेवी दषमलव वर्गीकरण पद्वति के अब तक 23 संस्करण प्रकाषित हो चूके है। 23वां संस्करण 2011 में प्रकाषित हुआ था तथा संक्षिप्त प्रकाषन अब तक 15 हो चूके है।
· 15वां संस्करण सन् 2012 में प्रकाषित हुआ था।
· डी डी सी का इलैक्ट्रानिक संस्करण सन् 1993 में डेवी फाॅर विंडोज के नाम से प्रकाषित हुआ था।
· इसका (डी डी सी) आॅनलाइन संस्करण वेब डेवी के नाम से सन् 2003 में 22वें संस्करण से प्रकाषित हुआ।
· वर्तमान में 23वें संस्करण तक ओसी एल सी (व्ब्स्ब्द्ध की वेबसाइट पर उपलब्ध है साथ ही इनका सी डी रोम संस्करण भी उपलब्ध है।
· डेवी दषमलव पद्वति (डी डी सी) के प्रथम संस्करण में षैडयूल के साथ-साथ अनुक्रमणी का भी प्रयोग किया गया था।
· डी डी सी के दुसरे संस्करण फाॅर्म डिविजन (वितउ कपअपेपवदद्ध का प्रयोग किया गया था। 12वें संस्करण तक रहा।
· 13वें संस्करण में 5 सहायक अनुसूचियों का प्रयोग किया गया।
· 14वें संस्करण में टेबल का प्रयोग किया गया जिसमें टेबल की संस्था 4 थी।
· डी डी सी के 15वें संस्करण में 9 फाॅर्म डिविजन का प्रयोग किया गया।
· 16वें तथा 17वें संस्करण का दो खण्ड़ों में प्रकाषन किया गया।
· 18वें, 19वें तथा 20वें संस्करण को तीन खण्डों में तथा 21वें, 22वें तथा 23वें संस्करण को चार खण्डों में प्रकाषित किया गयज्ञं
जो इस प्रकार हैः-
1 प्रथम:-तालिका
2 द्वितीय व तृतीयः-अनुसूची
3 चतुर्थः- अनुक्रणी
· डी डी सी में सम्पूर्ण ज्ञान जगत को विभाजित करने के लिए दस विभाजन पद्वति का प्रयोग किया गया है।
· डी डी सी में वर्ग बनाते समय आंखों को आराम और वाणी को विराम देने के लिए तीन अंकों के बाद बिन्दु (.) का प्रयोग किया जाता है।
DDC HISTORY
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Full edition |
publication year |
abridged edition |
publication year |
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1st |
1876 |
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2nd |
1885 |
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3rd |
1888 |
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4th |
1891 |
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5th |
1894 |
1st |
1895 |
|
6th |
1899 |
||
|
7th |
1911 |
||
|
8th |
1913 |
2nd |
1915 |
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9th |
1915 |
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10th |
1919 |
|
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11th |
1922 |
3rd |
1928 |
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12th |
1927 |
4th |
1929 |
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13th |
1932 |
5th |
1938 |
|
14th |
1942 |
6th |
1945 |
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15th |
1951 |
7th |
1953 |
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16th |
1958 |
8th |
1959 |
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17th |
1965 |
9th |
1965 |
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18th |
1971 |
10th |
1971 |
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19th |
1979 |
11th |
1979 |
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20th |
1989 |
12th |
1990 |
|
21st |
1996 |
13th |
1997 |
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22nd |
2003 |
14th |
2004 |
|
23rd |
2011 |
15th |
2012 |
कोेलन कलासिफिकेषन (द्विविन्दू वर्गीकरण):-
इस पुस्तकालय वर्गीकरण पद्वति का प्रकाषन डा0 एस आर रंगानाथन (1892-1972) द्वारा इनके गुरू डब्लयू सी0 बी0 सेयर्स (ॅब्ठ सेयर्स) से प्रेरित होकर 1933 में प्रथम संस्करण का प्रकाषन किया अब तक इसके सात संस्करण प्रकाषित हो चूके हैं। जिनके द्वारा पुस्तकालय वर्गीकरण के क्षेत्र में एक क्रांति पैदा कर दी गई तथा डा0 रंगानाथन को ख्याति प्राप्त हुई और भारतीय पुस्तकालय विज्ञान के जनक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
1. प्रथम संस्करण (1933):-
इस संस्करण को तीन भागों में प्रकाषित किया गयाः-
1 आधारभुत सिद्धान्त-127 पृष्ठ
2 अनुक्रमणिका-45 पृष्ठ
3 अनुसूची-135 पृष्ठ
इन तीनों भागों में कुल पृष्ठों की संख्या 307 थी।
2 द्वितीय संस्करण (1939):-
इस संस्करण को चार भागों में विभाजित किया गयाः-
1 नियम
2 अनुक्रमणिका
3 अनुसूची
4 वर्ग संख्याओं के उदाहरण
ग्रीक अक्षर डेल्टा ;।द्ध का प्रयोग किया गया तथा पाँच मुलभूत श्रेणियों का (व्यक्तित्व, पदार्थ, ऊर्जा, स्थान, समय) प्रयोग किया गया कोलन (ः) के साथ अष्टपदी अंकन का प्रयोग किया गया।
3 तृतीय संस्करण (1950):-
इस संस्करण में पक्ष परिसुत्र का तथा हाइफन ;.द्ध का प्रयोग षुरू हुआ।
4 चतुर्थ संस्करण (1952):-
इस संस्करण में पाँचों मुलभूत श्रेणियों के लिए अलग-अलग चिन्ह्ो का प्रयोग किया गया।
व्यक्तित्व - (,) कोमा
पदार्थ-(;) सेमीकोलन
ऊर्जा -(ः) कोलन
स्थान- (.) डाॅट
समय- (. ) डाॅट
5 पंचम संस्करण-
इस संस्करण में ग्रीक अक्षरों के स्थान पर रिक्त स्थान रखा गया। कुछ अनुसूची जैसेः- ललित कला, कृषि तथा कानून का समावेष किया गया।
6 षष्ठम संस्करण(1960)ः-
इस संस्करण में पाँच मुलभूत श्रेणियों समय के लिए डाॅट (.) के स्थान पर उल्टा उद्धरण चिन्ह (‘) का प्रयोग किया गया।
ग्रीक अक्षरों को समाप्त किया गया।
षष्ठम पुनर्मुद्रित संस्करण (1963)ः-
इस संस्करण को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है जैसे-
1 नियम
2 वर्गीकरण की सूचियँा
3 धार्मिक व आधे ग्रन्थों की सूचियँा
7 सप्तम संस्करण (1987)ः-
इस संस्करण को डाॅ. संस्करण को डाॅ0 एस. आर. रंगानाथन की मृत्यु के 15 वर्ष बाद ए. के. नीलमेघनन, एस. के. सीताराम, एम. ए. गोपीनाथ द्वारा प्रकाषन किया गया। सभी अधिकार षारदा रंगानाथन को ही समर्पित है। इस संस्करण मंे विषय, पक्ष, पंक्ति से संबंधित दषा संबंधों का प्रयोग हुआ।
डाॅ0 रंगानाथन महोदय ने सी सी के प्रकाषनों को तीन वर्गो में बांटा हैः-
1 से 3 तक के संस्करण -अपरिवर्तनीय पक्षात्मक पद्वति।
4 से 6 तक के संस्करण- लगभग मुक्त पक्षात्मक पद्वति।
7वें संस्करण - पुर्णतः मुक्त पक्षात्मक पद्वति।
कोलन वर्गीकरण पद्वति में नवीनतम प्रभावी दषक (लेटेस्ट इफेक्टिव डिकेड) का प्रयोग तहत 1970 को एन-7 तथा 1985 को एन-8 लिखते है।
अतं वाले अंक को छोड़ देते है।
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1700 and1799 = L
1800-1899= M
1900-1999 =N
2000-2099= P
कुछ प्रमुख वर्गीकरण पद्वतियँा:-
· डेवी दषमलव वर्गीकरण पद्वति -1876
· लाइब्रेरी आॅफ काग्रेंस वर्गीकरण पद्वति-1904
· सार्वभौमिक दषमलव वर्गीकरण पद्वति-1905
· कोलन वर्गीकरण पद्वति-1933
· बिब्लियोग्राफिक वर्गीकरण पद्वति-1935
पुस्तकालय वर्गीकरण के लाभः-
1- पुस्तकालय विज्ञान विषय में अध्ययन के साथ षोध को बढ़ावा ।
2- विषय का गहनता से अध्ययन।
3- विषय के प्रति जिज्ञासा का विकास।
4- वर्तमान सूचना विस्फोट में ग्रन्थों की सरलता से खोज।
5- विषयों की अधिकता पर नियंत्रण एवं व्यवस्थापन बनाए रखने में आसानी।
6- पुस्तको की समीक्षा करने में आसानी
7- विषयानुसार पुस्तक तथा अन्य सूचना सामग्रियों की न्यूवता अथवा अधिकता का आसानी से गणना की जा सकती है।
8- सूचना की प्रकृति के अनुसार सूचना सामग्री की मांग तथा वितरण संबंधी सभी आवश्यक आकंडों के मिलान में आसानी।
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|
|
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1933 |
1876 |
|
|
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|
|
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|
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|
|
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|
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|
|
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|
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|
निष्कर्ष
पुस्तकालय वर्गीकरण के इतिहास तथा इसकी मुख्य पद्वतियों का समावेष किया गया है। पुस्तकालय वर्गीकरण की उपयोगिता तथा विषेषताओंका वर्णन किया गया है। वर्गीकरण के क्षेत्र में भारतीय तथा विदेषी षिक्षा षास्त्री तथा दार्षनिकों द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण योगदान का वर्णन किया गया है। पुस्तकालय वर्गीकरण की व्यापकता, सरलता तथा उपयोगिता का चित्रण इस पेपर में बहुत सजीवता के साथ किया गया है। इस सबसे निष्कर्ष निकलता है कि पुस्तकालय वर्गीकरण अति आवष्यक एवं उद्देष्यपुर्ण होता है।
संदर्भः-
1- त्रिपाठी, एस0 एम एवं षौकीन, एन. एस. ग्रन्थालय वर्गीकरण के मुलतत्व आगराः वाई. के. पब्लिषर्स।
2- षर्मा, पाण्डेय, एसं के (1996) सरलीकृत ग्रन्थालय वर्गीकरण सिद्धान्त। दिल्लीः आगरा।
3- षर्मा, बी. के. और अन्य (1999) ग्रन्थालय एवं सूचना विज्ञान, आगराः।
4- प्रवीन कुमार यादव (2017), पुस्तकालय विकास पब्लिकेषन।
5- एम पी सतीजा (2008) , समाज विज्ञान में द्विबिन्दू वर्गीकरण का योगदान, एन ओ पी. आर. निस्केयर त्मेण्पद ;छवचतण् छप्ैब्।प्त्ण्त्मेण्पदद्ध
6- एम पी सतिजा (2001) ,ज्ञान के संगठनात्मक संबंध।
Received on 10.10.2020 Modified on 27.10.2020
Accepted on 18.11.2020 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):274-278.